महाराणा उदयसिंह का सम्पूर्ण जीवन परिचय


महाराणा उदयसिंह(द्वितीय)


मेवाड़ की राजधानी चित्तोड़ से उदयपुर लेकर आये। गिर्वा की पहाड़ियों के बीच उदयपुर शहर इन्ही की देन है।
उदयसिंह का जन्म सम्वत 1578 की भादवा सुदी 13 बुधवार(14 अगस्त 1521) को हुआ था।

उस समय चितोड़ की गद्दी पर महाराणा विक्रमादित्य बैठे थे। यह अयोग्य सिद्ध हुआ और गुजरात के बहादुर शाह ने दो बार आक्रमण कर मेवाड को नुकसान पहुंचाया इस दौरान 1300 महारानियों के साथ कर्मावती सती हो गई। विक्रमादित्य की हत्या दासीपुत्र बनवीर ने की तथा वह उदयसिंह की भी हत्या करना चाहता था।


लेकिन उदयसिंह को लेकर स्वामिभक्त पन्नाधाय जो खींची चौहान वंश की क्षत्राणी थी, उसने अपने पुत्र को उदयसिंह की जगह सुलाकर बनवीर की हाथ मरवा कर उदयसिंह को सुरक्षित लेकर प्रतापगढ़ तथा डूंगरपुर होती हुई कुंभलगढ़ पहुँची। वहां का किलेदार आशा देपुरा ने पन्ना से सारा हाल सुनकर उदयसिंह को अपने पास सुरक्षित रखा। उदयसिंह के जीवित होने की बात सब जगह फेल गयी। उदयसिंह 15 वर्ष का होने के कारण कई सरदार तथा उसकी ननिहाल (बूंदी) वाले उसे अच्छी तरह पहचानते थे। सरदारों ने उदयसिंह को मेवाड़ का स्वामी माना तथा सेना इखट्ठी कर बनवीर को मावली गांव के पास हराया। इस प्रकार वि.स्. 1597(ई.स्. 1540) में उदयसिंह को राजगद्दी पर बिठाया।

उदयसिंह ने झाला सज्जा के पुत्र जैतसिंह की पुत्री से विवाह कर जोधपुर के राव मालदेव से वैर बांध लिया क्योंकि राव मालदेव उस कन्या से ब्याह करना चाहता था। इसी कारण से राव मालदेव का उदयसिंह के साथ कुम्भलगढ़ में युद्ध हुआ जिसमें मालदेव राठौड़ की सेना भाग निकली।


वि.स्. 1600 में शेरशाह सुर जोधपुर के राव मालदेव से जोधपुर छीनकर चित्तोड़ की और बढ़ा। जब शेरशाह सुर चितोड़ से 12 कोस दूर था तब उदयसिंह के राज्य का प्रारम्भ काल ही था जिससे सम्भव है उसने शेरशाह सुर से लड़ना अनुचित समझ किले की चाबियां उसके पास भेज दी हो तथा उससे सुलह कर लोटा दिया।


मेवात(अलवर) का हाकिम हाजिखां पठान अकबर से डर कर अजमेर भाग गया। राव मालदेव ने उसे लूटने के लिए अजमेर सेना भेजी। हाजिखां ने महाराणा से सहायता मांगी। महाराणा की मालदेव से खटपट होने के कारण हाजिखां की सहायतार्थ चले आये परन्तु कोई युद्ध नहीं हुआ। उदयसिंह ने इस सहायता के बदले हाजिखां से उसकी रंगराय नाम की वैश्या को माँगा। परन्तु हाजिखां राजी राजी न हुआ और इससे दोनों सेनाओं के बीच वि.स्. 1613 को अजमेर जिले के हरमाड़ा गांव में युद्ध हुआ। युद्ध प्रारम्भ होने से पहले हाजिखां की सहायता के लिये मालदेव की सेना भी आ गईं। महाराणा के तीर लगने से उसकी सेना ने पीठ दिखाई। इस तरह एक वेश्या के लिये विलासी महाराणा की बहुत सी सेना एवं सरदार मारे गये।

वि.स्. 1616 में महाराणा के कुँवर प्रतापसिंह के महाराजकुमार अमरसिंह का 16 मार्च 1559 को जन्म हुआ। इस अवसर पर उदयसिंह चितोड़ से  एकलिंगजी के दर्शन करने गये, तब महाराणा ने इन पहाड़ो में राजधानी बसाने का उचित समझ अपने सरदारों से सलाह की, जो सबको पसन्द आई। इस प्रकार उदयपुर शहर बसाने का निश्चय कर वर्तमान उदयपुर से कुछ उत्तर में महल तथा शहर बसाना सुरु किया, जिसके कुछ महल ‘मोती महल’(जो वर्तमान में महाराणा प्रताप स्मारक समिति, मोती मंगरी, उदयपुर में स्थित है) नाम से विद्धमान है।

अकबर से पूर्व तीन सौ से अधिक वर्षो तक मुसलमानों के भिन्न-भिन्न सात राजवंशो में से किसी भी वंश ने 100 वर्ष तक लगातार दिल्ली पर शासन नही किया। लेकिन अकबर बड़ा चतुर बादशाह था, अच्छी तरह जानता था कि भारतवर्ष में राज्य स्थापित करने के लिए राजपूत नरेशो को अपना सहायक बनाना नितान्त आवश्यक है। इसलिए सबसे पहले आमेर के राजा भारमल कछवाहे को अपना सेवक बना कर उसकी प्रतिष्ठा बढ़ाई। वो यह भी जानता था कि राजपूतो में मेवाड़ का महाराणा शिरोमणि माना जाता है जो सबसे प्रबल होता है। इसलिए महाराणा के अधीन हो जाने पर अन्य सभी राजपूत राजा भी मेरी अधीनता स्वीकार कर लेंगे और मुग़ल साम्राज्य की नींव दृढ हो जायेगी। इसलिए आकबर ने चित्तोड़ पर हमला करना निश्चय कर लिया कर लिया। इधर महाराणा को भी खबर मिलने पर उन्होंने सरदारों को बुलाया और उनके कहने से उदयसिंह ने चितौड़ का किला राठौड़ जयमल मेड़तिया पत्ता(प्रतापसिंह) चुण्डावत सिसोदिया को सेनाध्यक्ष नियत कर रावत नेतसी आदि कुछ सरदारों सहित मेवाड़ के पहाड़ो में चला गया। और किले की रक्षा करने के लिए 8000 राजपूत रहे।

अकबर ने वि.स्. 1624 को मगसर बदी 6(23 अक्टूबर 1567) को किले पास पहुँच कर घेरा डाला। शाही सेना ने शिवपुर, माण्डलगढ़ और रामपुर के किले विजयी कर लिए। महाराणा के पीछे भी शाही सेना भेजी गयी परन्तु महाराणा का पत्ता नहीं लगा सकी। बादशाह ने सुरंगे और साबत (जमीन में ढके हुए रास्ते जिससे सेना किले की दिवार तक पहुँच सके) बनवाना आरम्भ किया। एक दिन सरदारों ने मिलकर रावत साहिब खान चौहान और डोडिया ठाकुर सांडा को अकबर के पास संधि का प्रस्ताव लेकर भेजा परन्तु अकबर ने नहीं माना। इसके बाद राजपूत बड़े जोश में लड़ने लगे। दो सुरंगे किले की तलहटी तक पहुँच गयी, एक में 80 मण और दूसरी में 120 मण बारूद भरी गयी। इसके छूटने से किले का बुर्ज उड़ गया जिससे कई राजपूत योद्धा घायल हुए। बादशाह के सैनिकों ने कई जगह किले की दीवारें तोड़ दी परन्तु राजपूतो ने फिर से बना ली। एक समय दीवारों की मरम्मत कराते हुए सेनापति जयमल मेड़तिया भी अकबर की संग्राम नामक बन्दुक की गोली से लंगड़ा हुआ। इस प्रकार युद्ध होता रहा परन्तु युद्ध में कोई सफलता न हुई।अन्त में किले में भोजन सामग्री नहीं रही तब राजपूतो ने किले के दरवाजे खोलकर युद्ध में मर मिटने का पक्का इरादा कर लिया। उन्होंने अपनी-अपनी स्त्रीयों और बच्चों को जौहर की धधकती हुई आग में भस्म करके, केसरिया बाना पहनकर किले के द्वार चैत्र बदी 11 को खुलवा दिये और शत्रुओं पर टूट पड़े। घमासान युद्ध हुआ।

बादशाह की गोली लगने के कारण जयमल लँगड़ा हो गया था, इसलिये उसने कहा कि में पैर टूट जाने के कारण घोड़े पर नहीं चढ़ सकता, परन्तु लड़ने की इच्छा तो रह गयी है। इस पर उसके कुटम्बी वीर कल्ला राठौड़ ने उसे अपने कंधे पर बिठाकर कहा कि अब लड़ने की अपनी इच्छा पूरी कर लीजिये। फिर वे दोनों नंगी तलवारे हाथ में लेकर लड़ते हुए हनुमान पोल और भैरव पोल के बीच में वीरगति को प्राप्त हुए। उसी स्थान पर उन दोनों के स्मारक बने हुए है। डोडिया सांडा घोड़े पर सवार होकर शत्रु-सेना को काटता हुआ गम्भीरी नदी के पश्चिमी किनारे पर मारा गया। ईसरदास चौहान ने एक हाथ से अकबर के हाथी का दांत पकड़ा और दूसरे से सूंड पर ख़ंजर मार कर कहा कि गुणग्राहक बादशाह को मेरा मुजरा पहुँचे। इसी तरह कई राजपूतो ने हाथी के दांत तोड़ डाले और कइयों ने सुण्डे काट डाली। राजपूतो की अलौकिक वीरता से शत्रुओं का कलेजा काँप उठा परन्तु बादशाह की सेना की संख्या असंख्य थी, जबकि किले में राजपूत कैवल 8000 ही थे और सभी वीरगति को प्राप्त हुए।

इसीप्रकार पत्ता(प्रतापसिंह) चुण्डावत सिसोदिया ने भी बड़ी वीरता दिखलाई और शत्रुओं से घिरकर चितौड़गढ़ के सूरजपोल दरवाजे के पास वीरगति को प्राप्त हुआ।
अकबर ने चित्तौड़ पर अपना अधिकार वि.स्. 1624 चैत्र बदि 13(25 फरवरी 1568) को कर लिया। यह चितौड़गढ़ का तीसरा शाखा कहलाता है। इस युद्ध में जयमल और पत्ता की अपूर्व वीरता पर मुग्ध होकर बादशाह अकबर ने उन दोनों की हाथी पर चढ़ी हुई संगमरमर की मूर्तियां बनवाकर आगरे के किले के द्वार पर खड़ी करवाई। चितौड़ पर अधिकार करने के बाद अकबर केवल 3 दिन वहाँ रहा और आसफखां को किले का हाकम बनाकर अजमेर होता हुआ आगरा लौटा।

महाराणा उदयसिंह अपने बचे हुए राजपूतो के साथ चार महीने पहाड़ो में बिताकर उदयपुर आये और अधूरे महलो को पूरा कराया। उदयसागर तालाब बनवाना सुरु किया और पिछोला तालाब पर घनश्याम का मंदिर बनवाया। इसी समय से मेवाड़ की राजधानी उदयपुर बसनी सुरु हुई। जब से चितौड़ शत्रुओं के हाथ में गया, महाराणा प्रायः कुम्भलगढ़ के किले में ही रहा करते थे, क्योंकि उदयपुर शहर पूरी तरह बसा नहीं था। वि.स्. 1628 में वह कुंभलगढ़ से गोगुन्दा गांव में आये और वही फाल्गुन सुदी 15(28 फरवरी 1572) को उनका देहांत हो गया, जहाँ उनकी छत्री बनी हुई है।

महाराणा उदयसिंह के 20 रानियो से 25 कुँवरो :- 1 प्रतापसिंह 2 शक्तिसिंह 3 जैतसिंह 4 कान्हा 5 रायसिंह 7 शार्दूलसिंह 8 रिद्रसिंह 9 जगमाल 10 सगर 11 अगर 12 सिया 13 पंचायण 14 नारायण दास 15 सुरताण 16 लूणकरण 17 महेशदास 18 चंदा 19 भावसिंह 20 नेतसिंह 21 सिंहा 22 नगराज 23 वेरिशाल 24 मानसिंह 25 साहिब तथा 20 लडकियाँ थी।

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