राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव राव बलिराम हेडगेवार का सम्पूर्ण साहसिक जीवन परिचय


राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. केशव राव बलीराम हेडगेवार (dr.Keshav rao Baliram Hedgewar) का जन्म 1 अप्रैल 1889 को नागपुर के एक गरीब ब्राह्मण परिवार में हुआ था। वह बचपन से ही क्रांतिकारी प्रवृति के थे और उन्हें अंग्रेज शासको से घृणा थी।

अभी बाल्यकाल में स्कूल में ही पढ़ते थे कि स्कुल में बच्चों को मिठाई बांटी जा रही थी जब 11 वर्ष के बालक केशव को मिठाई का टुकड़ा दिया गया तो उसने पूछा:यह मिठाई किस बात की है?
केसा बुद्धिमान रहा होगा डॉ. केशव राव का बाल्यकाल ! जीभ पर लंपट नहीं वरन विवेक विचार का धनी रहा होगा
बालक को बताया गया :- आज महारानी विक्टोरिया का जन्मदिन है इसलिए ख़ुशी मनाई जा रही है।
बालक ने तुरंत मिठाई के टुकड़े को नाली में फेंक दिया और कहा- रानी विक्टोरिया अंग्रेजो की रानी है और उन अंग्रेजो ने हमे गुलाम बनाया रखा है। गुलाम बनाने वाले के जन्मदिन की खुशियाँ हम क्यों मनायें,? हम तो खुशियाँ तब मनाएंगे जब हम अपने देश भारत को आजाद करा लेंगे ।

वह बुद्धिमान बालक केशव जब नागपुर के निलसिटी हाई स्कूल में पढ़ते थे, तब उन्होंने देखा कि अंग्रेज जोर जुल्म करके हमें हमारी संस्क्रति से, हमारे धर्म से, हमारी मातृभक्ति से दूर कर रहे है। यहाँ तक कि वन्दे मातरम् कहने पर भी प्रतिबंध लगा दिया है !
वह धैर्यवान और बुद्धिमान बालक केशव हर कक्षा के प्रमुख से मिले और उनके साथ गुप्त बैठक की। उन्होंने कहा:- हम अपनी मातृभूमि में रहते है और इस दुष्ट अंग्रेज सरकार द्वारा हमें ही वन्दे मातरम् कहने से रोका जाता है। इस अंग्रेज सरकार की ऐसी-तैसी…..,,,,
जो हिम्मतवान और बुद्धिमान लड़के थे उन्होंने केशव का साथ दिया और सभी ने मिलकर तय किया क्या करना है। लेकिन यह बात गुप्त रखनी जरूरी थी और अपने नेता का नाम भी नहीं लेना है। यह बात प्रत्येक कक्षा प्रमुख ने तय कर ली।
अंग्रेज इंस्पेक्टर के स्कूल में निरिक्षण के लिए आने पर केशव राव (Keshav Baliram Hedgewar) ने अपने कुछ सहपाठियों के साथ उनका “वन्दे मातरम” जयघोष से स्वागत किया जिस पर वह बिफर गया| शिक्षक भारतीय तो थे लेकिन अंग्रेजो की गुलामी से जकड़े हुए थे, अतः चौक गये अंग्रेज इंस्पेक्टर हड़बड़ाकर बोला:- यह क्या बदतमीजी है,,? यह वन्दे मातरम् किसने सिखाया ? उसको खोजो, पकड़ो।
दूसरी कक्षा में गये, वहां भी बच्चों ने खड़े होकर कहा :- वन्दे मातरम् !
स्कुल की हर कक्षा के विद्यार्थियो ने ऐसा ही किया।
अंग्रेज इंस्पेक्टर बौखला गया और चिल्लाया – किसने दी यह सिख,,,?
सब बच्चों से कहा गया परन्तु किसी ने नाम नहीं बताया। उस इंस्पेक्टर ने कहा:- तुम सबको स्कुल से निकाल देंगे।
बच्चे बोले :-तुम क्या निकालोगे,,,? हम ही चले। जिस स्कुल में हम अपनी मातृभूमि की वंदना न कर सके, वन्दे मातरम् भी नहीं कह सकते, ऐसे स्कुल में हमे नहीं पड़ना।
उन दुष्ट अधिकारियो ने सोचा क़ि अब क्या करे,,,? फिर उन्होंने बच्चों के माँ बाप पर दबाव डाला कि, बच्चों को समझाओ, सिखाओ की वे माफ़ी मांग ले।


केशव के माता-पिता ने कहा:- बेटा ! माफ़ी मांग लो।
केशव:- हमने कोई गुनाह नहीं किया तो माफ़ी क्यों मांगे,,,?
किसीने केशव से कहा:- देश सेवा और लोगो को जगाने की बात इस उम्र में मत करो, अभी तो पढ़ाई करो।
केशव:- बड़े बुजुर्ग और अधिकारी लोग मुझे सिखाते है कि देश सेवा बाद में करना। जो काम आपको करना चाहिए वह आप नहीं कर रहे इसलिए हम बच्चों को करना पड़ेगा। आप मुझे अक्ल देते है,,,? अंगेज हमे दबोच रहे है, हमे गुलाम बनाये जा रहे है और हिंदुओं का धर्मान्तरण कराये जा रहे है और आ चुप्पी साध रहे है। आप जुल्म के सामने लोहा लेने का संकल्प करें तो में पढ़ाई में लग जाऊंगा, नहीं तो पढाई के साथ देश की आजादी की पढ़ाई भी में पढूँगा। और दूसरे विद्यार्थियों को भी मजबूत बनाऊँगा।


आखिर बड़े बुजुर्गों को कहना पड़ा:- यह भले ही 14 वर्ष का बालक लगता है लेकिन है कोई होनहार। उन्होंने केशव की पीठ थपथपाते हुए कहा:- शाबाश है, शाबाश.!
आप मुझे शाबाशी तो देते है लेकिन आप भी जरा हिम्मत से काम ले। जुल्म करना तो पाप है लेकिन उस जुल्म को सहना दुगुना पाप है।
केशव ने बड़े-बुझुर्गो को सरलता से, नम्रता से, धीरज से समझाया।
अंग्रेज शासक 14 वर्षीय बालकका लोहा मान गए कि उसके आगे हमारे षड्यंत्र गये तथा उन्हें स्कुल से निकाल दिया गया तब उन्होंने मैट्रिक तक अपनी पढाई पूना के नेशनल स्कूल में पुरी की|


एक बार नागपुर के पास यवतमाल(महाराष्ट्र) में केशव अपने साथियो के साथ कही टहलने जा रहा था। उस जमाने में अंग्रेजो का बड़ा दबदबा था। वहाँ के अंग्रेज कलक्टर का तो इतना सिर चढ़ गया था कि कोई भी उसको सलाम मारे बिना गुजरता तो उसे दंडित किया जाता था।


सैर करने जा रहे केशव और उनके साथियो को वही अंग्रेज कलक्टर सामने मिल गया। बड़ी बड़ी उम्र के लोग उसे सलाम कर थे थे। सबने केशव से कहा:- अंग्रेज कलक्टर साहब आ रहे है इन्हें सलाम करो।

उस 15-16 वर्षीय केशव ने प्रणाम नहीं किया। कलक्टर के सिपाहियों ने उन्हें पकड़ लिया और कहा :- तू प्रणाम क्यों नहीं करता,,,? साहब तेरे से बड़े है।
केशव:- में इनको प्रणाम क्यों करू,,,? ये कोई महात्मा नहीं है सिर्फ एक सरकारी नोकर है। अगर अच्छा काम करते तो आदर से सलाम किया जाता, जोर-जुल्म से प्रणाम कराने की कोई जरूरत नहीं है।
कलक्टर गुर्राकर देखने लगा। अंग्रेज कलक्टर की तरफ प्रेम की निगाह डालते हुए केशव ने कहा:- प्रणाम भीतर के आदर की चीज होती है। जोर-जुल्म से प्रणाम करवाना आपको शोभा नहीं देता। ह्रदय में आदर नहीं होतो झूठमूठ में प्रणाम करना पाप माना जाता है, फिर भी आप मुझे क्यों जोर-जबरदस्ती करके पाप में डालते हो,,,? दिखावटी प्रणाम से कोई फायदा नहीं होने वाला।


अंग्रेज कलक्टर का सिर नीचा हो गया, और बोला:- इसे जाने दो यह साधारण बालक नहीं है।
15-16 वर्षीय बालक की कैसी दक्षता है कि दुश्मनी के भाव से भरे कलक्टर को भी सिर नीचे करके कहना पड़ा:- इसको जाने दो।
यवतमाल में यह बात बड़ी तीव्र गति से फेल गयी और लोग वाहवाही करने लगे, केशव ने कमाल कर दिया। आज तक जो सबको प्रणाम करवाता था, ऐबक सिर झुकाने पर मजबूर करता था, केशव से उसका सिर झुकवा दिया।

पढ़ते-पढ़ते आगे चलकर 1910 में जब डॉक्टरी की पढाई के लिए कोलकाता गये। वहां मेडिकल कॉलेज में सुरेंद्र घोष नामक एक बड़ा लम्बा-तगड़ा विद्यार्थी था। वह रोज पल-अप्स करता था और दंड बैठक भी लगाता था। अपनी भुजाओं पर उसे बड़ा गर्व था कि अगर एक घूसाँ वह किसी को लगा दे तो वह दूसरा न मांगे।
एक दिन कॉलेज में जब उसने केशव की प्रशंसा सुनी तब वह केशव के सामने गया और बोला:- क्यों रे! तू बड़ा बुद्धिमान, शौर्यवान, और धैर्यवान होकर उभर रहा है। अगर ऐसा शूरवीर तो मुझे मुक्के मार, में भी तो देखु जरा तेरी ताकत।
केशव:- नहीं नहीं, भैया! में आपको नहीं मारूँगा। हां अगर आप चाहे तो मुझे मुक्के मार सकते है। ऐसा कहकर केशव ने अपनी दोनों भुजा आगे कर दी।
वह जो रोज पल अप्स करके, कसरत करके अपने शरीर को मजबूत बनाता था, उसने मुक्के मारे:- एक, दो, तीन,……..पांच…… दस…. पन्द्रह….. पच्चीस…. तीस…..चालीस… मुक्के मारते मारते आखिर सुरेंद्र घोष थक गया, पसीने से तार-बतर हो गया। देखने वाले लोग चकित हो गये।


आखीर में सुरेंद्र ने कहा:- तेरा शारीर हाड़-मांस का है या लोहे का,,,? सच तू कोण है, मुक्के मारते-मारते में थक गया पर तू उफ़्फ़ तक नहीं करता,,,
प्राणायाम का रहस्य जाना होगा केशवराव ने। आत्मबल बचपन से ही विकसित था। दुश्मनी के भाव से भरा सुरेंद्र घोष केशव का मित्र बन गया और गले लग गया।

कलकत्ता के प्रसिद्ध मौलवी लियाकत हुसैन 60 साल के थे और नेतागिरी में उनका बड़ा नाम था। नेतागिरी में उनको जो खुशिया मिलती थी, उनसे वो 60 साल के होते हुए भी चलने, बोलने, और काम करने में जवानों को भी पीछे कर देते थे।


मौलवी ने केशवराव को एक सभा में देखा। उस सभा में किसी ने भाषण में लोकमान्य तिलक के लिए कुछ हल्के शब्दो का उपयोग किया। देशभक्ति से भरे हुए लोकमान्य तिलक के लिए हल्के शब्द बोलने और भारतीय संस्क्रति को वन्दे मातरम् निहारने वाले लोगो को खरी-खोटी सुनाने की जब उसने बदतमीजी की तो युवक केशव उठे, मंच पर पहुँचकर उस वक्ता को कान पकड़कर तीन तमाचे जड़ दिये। आयोजक और उनके आदमी आये और केशव का हाथ पकड़ने लगे तो केशव ने हाथ पकड़ने वाले को भी तमाचे जमा दिये। केशव का यह शौर्य, देशभक्ति और आत्मनिर्भरता देखकर मौलवी लियाकत हुसैन बोल उठे:- आफरीन है, आफरीन है! भारत के लाल! आफरीन है!


लियाकत हुसैन दौड़ पड़े और केशव को गले लगा लिया, फिर बोले:- आज से आप और हम जिगरी दोस्त! मेरा कोई भी कार्यक्रम होगा, उसमे में आपको बुलाऊ तो क्या आएंगे,,?

केशव:- क्यों नहीं, भैया ! हम सभी भारतवासी है।
जब भी लियाकत हुसैन कार्यक्रम करते, तब केशव को अवश्य बुलाते और केशव अपने साथियो सहित भगवा ध्वज लेकर उनके हर कार्यक्रम में जाते। वन्दे मातरम् की ध्वनि से आकाश गूँज उठता था।

फिर बाद में उस समय वहा देश की नामी क्रांतिकारी संस्था अनुशीलन समिति से जुड़ गये| 1915 में नागपुर लौटने पर वह कांग्रेस में सक्रिय हो गये और कुछ समय में विदर्भ प्रांतीय कांग्रेस के सचिव बन गये| 1920 में जब नागपुर में कांग्रेस का देश स्तरीय अधिवेशन हुआ तो डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgewar) ने कांग्रेस में पहली बार पूर्ण स्वतंत्रता को लक्ष्य बनाने के बारे में प्रस्ताव प्रस्तुत किया तो तब पारित नही किया गया| 1921 में कांग्रेस के असहयोग आन्दोलन में सत्याग्रह कर गिरफ्तारी दी और उन्हें एक वर्ष की जेल हुयी | तब तक वह इतने लोकप्रिय हो चुके थे कि उनकी रिहाई पर उनके स्वागत के लिए आयोजित सभा को पंडित मोतीलाल नेहरु और हकीम अजमल खा जैसे दिग्गजों ने संबोधित किया|
कांग्रेस में पुरी तन्मन्यता के साथ भागीदारी और जेल जीवन के दौरान जो अनुभव पाए, उससे वह यह सोचने को प्रवृत हुए कि समाज में जिस एकता और धुंधली पड़ी देशभक्ति की भावना के कारण हम परतंत्र हुए है वह केवल कांग्रेस के जन आन्दोलन से जागृत और पृष्ट नही हो सकती| जन-तन्त्र के परतंत्रता के विरुद्ध विद्रोह की भावना जगाने का कार्य बेशक चलता रहे लेकिन राष्ट्र जीवन में गहरी हुयी विघटनवादी प्रवृति को दूर करने के लिए कुछ भिन्न उपाय की जरूरत है| 

डा. केशव राव बलीराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgewar) के इसी चिन्तन एवं मंथन का प्रतिफल थी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ नाम से संस्कारशाला के रूप में शाखा पद्दति की स्थापना जो दिखने में साधारण किन्तु परिणाम में चमत्कारी सिद्ध हुयी|


1925 में विजयदशमी के दिन संघ कार्य की शुरुवात के बाद भी उनका कांग्रेस और क्रांतिकारीयो के प्रति रुख सकारात्मक रहा | यही कारण था कि दिसम्बर 1930 में जब महात्मा गांधी द्वारा नमक कानून विरोधी आन्दोलन छेड़ा गया तो उसमे भी उन्होंने संघ प्रमुख (सरसंघ चालक) की जिम्मेदारी डॉ. परापंजे को सौप कर व्यक्तिगत रूप से अपने एक दर्जन सहयोगियों के साथ भाग लिया जिसमे उन्हें 9 माह की कैद हुयी| इसी तरह 1929 में जब लाहौर में हुए कांग्रेस अधिवेशन में पूर्व स्वराज का प्रस्ताव पास किया गया और 26 जनवरी 1930 को देश भर में तिरंगा फहराने का आह्वान किया तो डॉ. केशव राव बलीराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgewar) के निर्देश पर सभी संघ शाखाओं में 30 जनवरी को तिरंगा फहराकर पूर्ण स्वराज प्राप्ति का संकल्प किया गया|

इसी तरह क्रांतिकारीयो से भी उनके संबध चलते रहे| जब 1928 में लाहौर में उप कप्तान सांडर्स की हत्या के बाद भगतसिंह, राजगुरु और सुखदेव फरार हुए तो राजगुरु फरारी के दौरान नागपुर में डॉ. केशव राव बलीराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgewar) के पास पहुचे थे जिन्होंने उमरेड में एक प्रमुख संघ अधिकारी भय्या जी ढाणी के निवास पर ठहरने की व्वयस्था की थी|


ऐसे युगपुरुष थे डॉ. केशव राव बलीराम हेडगेवार (Keshav Baliram Hedgewar) जिनका जून 1940 को निधन हो गया था किन्तु संघ कार्य अविरल चल रहा है| जिनके संस्कार आज भी दुनियाभर के बच्चों और जवानों के दिल तक पहुँच रहे है।

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