महाराणा कुम्भा की जीवनी/ कुम्भलगढ़/कीर्ति स्तम्भ

महाराणा कुम्भा

महाराणा मोकल के बाद उनके ज्येष्ठ पुत्र कुम्भकर्ण(कुम्भा) मेवाड़ की शान गद्दी पर बिराजे। महाराणा कुम्भा मेवाड़ के सीसोदियो की राणा शाखा के राजाओं में बड़ा प्रतापी राजा हुआ। वे अपने समय के सबसे प्रबल हिन्दू राजा थे। जिनके विरुद्ध महाराजाधिराज, रायराय(राजराय), राणेरॉय, महाराणा, राजगुरु, दानगुरु, शेलगुरु, परमगुरु, चपगुरु, टोडरमल और हिन्दू सुरताण आदि शिलालेखों में मिलते है। जो उसका राजाओं का शिरोमणि, विद्धवान, दानी और महाप्रतापी होना सूचित करते है।


महाराणा कुम्भा ने राज्यसिंहासन पर बैठते ही सर्वप्रथम अपने पिता को मारने वाला से बदला लेने का निश्चय किया। मंडोर के राव रणमल ने चितौड आकर वहां से 500 सवार साथ लेकर पाई कोटड़ा के पहाड़ो में जाकर भैलो को अपने पक्ष में किया। तदनन्तर महाराणा ने अपने पिता को मारने वालो चाचा व् मेरा तथा उसके पक्षकारों से बदला लेकर अपनी क्रोधग्नि शांत की। उस समय चाचा के पुत्र एका और महपा पंवार ने भाग कर माण्डू के सुल्तान के वहां शरण ली।

कुम्भलगढ़ का किला

इससे रणमल का प्रभाव मेवाड़ में बढ़ गया और महाराणा का कृपापात्र हो गया। ततपश्चात रणमल अपने अपने पक्ष के राठौड़ो को अच्छे अच्छे पदों पर नियुक्त कर महाराणा के दरबार में अपना प्रभाव दिन दिन बढ़ाता गया। राणमल ने कपट से महाराणा मोकल के भाई राघवदेव को मरवा डाला। इस घटना से महाराणा कुम्भा के दिल में रणमल के प्रति सन्देह उतपन्न हो गया। इस माना जाता है कि महाराणा मोकल के मारे जाने पर सिरोही के स्वामी ने सीमा से मिले हुए मेवाड़ के कुछ गांव दबा लिए, जिस पर महाराणा ने दौड़िये नरसिंह के अध्यक्षता में फ़ौज भेजकर आबू तथा उसके निकट का कुछ प्रदेश बल पूर्वक छीन कर अपने अधीन कर लिया।

कुम्भलगढ़ किले का मुख्य द्वार 

महाराणा कुम्भा ने विस्. 1494(ई. सन 1437) में मालवे(माण्डू) के सुल्तान महमूद द्वारा महपा पंवार को सुपुर्द नहीं करने के कारण मालवे पर 1 लाख सवार ओर 1400 हाथी की सेना के साथ चढ़ाई की तथा सारंगपुर के पास दोनों सेनाओं के बीच घमासान युद्ध हुआ। जिसमें महमूद हारकर भाग गया। वीर विनोद के अनुसार सुल्तान भाग कर माण्डू के किले में जाकर रहा और उसने महपा पंवार को वहां से जाने के लिए कहा जिसके बाद महपा पंवार गुजरात की तरफ चला गया। इस पर महाराणा कुम्भा ने माण्डू का किला जा घेरा और सुल्तान महमूद को कैदी बनाकर चितौड ले आया। फिर छह महीने कैद रखने के पश्चात बिना किसी दंड लिए सुल्तान को छोड़ दिया। अपने शत्रु से कुछ नही लेकर इसके विपरीत उसे भेंट देकर स्वतंत्र कर देने के लिये, अबुल फजल में महाराणा कुम्भा की बड़ी प्रशंसा का उल्लेख मिलता है। इस विजय के उपलक्ष्य में महाराणा ने चित्तौड़ पर विशाल कीर्तिस्तम्भ बनवाया, जो अभी तक विद्दमान है।

महाराणा कुम्भा बड़े दयालु थे क्योंकि जब महपा पंवार और चाचा का पुत्र एका उनके पैरों में आ गिरे और अपना अपराध क्षमा करने की प्रार्थना की तो महाराणा ने दया करके शरण में आये अपराधियो का अपराध क्षमा कर दिया।

कुम्भलगढ़ किले की विशालकाय ऊँची दीवारे

महाराणा कुम्भा ने सारंगपुर, नागौर, गागरोन, अजमेर, मण्डोर, बड़ी, खाटू, चाटसू आदि तक उनको आक्रमण कर जीता। और अपने राज्य का निरन्तर विस्तार किया। आबू को विजय कर अपने राज्य का अंग बनाया। बूंदी को भी जीता तथा माण्डू के शासक महमूद का मान मर्दन किया। कुम्भा ने सारा हाड़ौती प्रदेश विजय कर अपने राज्य में मिलाया। महाराणा कुम्भा ने मालवे तथा गुजरात के सुलतानों की संयुक्त सेना को परास्त किया। उन्होंने दिल्ली के सुल्तान का कुछ प्रदेश, राजपूताने का अधिकांश क्षेत्र तथा मालवे एवं गुजरात के राज्यो का कुछ भाग छीनकर अपने राज्य में मिला लिया था। दिल्ली और गुजरात के राज्यो की भूमि पर महाराणा के प्रबल पराक्रम के साथ आक्रमण करने के कारण वहाँ के सुल्तानों ने छत्र भेंट कर महाराणा कुम्भा को हिन्दू सुरत्राण का विरुद(उपादि) प्रदान किया था।

महाराणा कुम्भा केवल युद्ध प्रिय ही नहीं थे अपितु कला एवं साहित्य के भी वे बहुत बड़े प्रेमी थे। मेवाड़ में उन्होंने कुम्भलगढ़ सहित कई छोटे बड़े 84 किलो में से 32 किलो का निर्माण करवाया, अनेक मंदिर तथा जलाशय बनवाये, एकलिंगजी के मंदिर का जीर्णोद्धार कराया, और अनेक साहित्यकारों को प्रोत्साहित किया। महाराणा कुम्भा जैसे वीर और युद्धकुशल थे, वैसे ही पूर्ण विद्यानुरागी, स्वयं वेद, स्मृति, मीमांसा, उपनिषद, व्याकरण आदि में प्रवीण थे। वह स्वयं बड़े विद्वान और विद्वानों का सम्मान कटने वाले थे। विस्. 1525(ई. सन 1468) में उनके राज्य लोभी दुष्ट पुत्र ऊदा(उदयसिंह) ने महाराणा कुम्भा की कुम्भलगढ़ में मामादेव मंदिर के निकट कटार से अचानक वार कर हत्या कर दी।

महाराणा कुम्भा के ग्यारह पुत्र- 1.ऊदा(उदयसिंह) 2.रायमल 3.नगराज 4.गोपालसिंह 5.आसकरण 6.अमरसिंह 7. गोविन्ददास 8. जैतसिंह 9. महरावण 10. क्षेत्रसिंह और 11. अचलदास थे।

महाराणा कुम्भा कुम्भा द्वारा निर्मित प्रमुख दुर्ग और किले

कुम्भलगढ़ दुर्ग: विश्व की दूसरी सबसे लंबी दिवार

राजस्थान के राजसमंद जिले में स्थित कुम्भलगढ़ दुर्ग कि दीवार जो कि 36 किलोमीटर लम्बी तथा 15 फीट चौड़ी है। इस दुर्ग का निर्माण महाराणा कुम्भा ने करवाया था। यह दुर्ग समुद्रतल से करीब 1100 मीटर कि ऊचाईं पर स्थित है। इसका निर्माण सम्राट अशोक के दूसरे पुत्र सम्प्रति के बनाए दुर्ग के अवशेषो पर किया गया था। इस दुर्ग के पूर्ण निर्माण में 15 साल (1443-1458) लगे थे। दुर्ग का निर्माण पूर्ण होने पर महाराणा कुम्भ ने सिक्के बनवाये थे जिन पर दुर्ग और इसका नाम अंकित था।


दुर्ग कई घाटियों व पहाड़ियों को मिला कर बनाया गया है जिससे यह प्राकृतिक सुरक्षात्मक आधार पाकर अजेय रहा। इस दुर्ग में ऊँचे स्थानों पर महल,मंदिर व आवासीय इमारते बनायीं गई और समतल भूमि का उपयोग कृषि कार्य के लिए किया गया वही ढलान वाले भागो का उपयोग जलाशयों के लिए कर इस दुर्ग को यथासंभव स्वाबलंबी बनाया गया। इस दुर्ग के अंदर 360 से ज्यादा मंदिर हैं जिनमे से 300 प्राचीन जैन मंदिर तथा बाकि हिन्दू मंदिर हैं।


इस दुर्ग के भीतर एक औरगढ़ है जिसे कटारगढ़ के नाम से जाना जाता है यह गढ़ सात विशाल द्वारों व सुद्रढ़ प्राचीरों से सुरक्षित है। इस गढ़ के शीर्ष भाग में बादल महल है व कुम्भा महल सबसे ऊपर है। महाराणा प्रताप की जन्म स्थली कुम्भलगढ़ एक तरह से मेवाड़ की संकटकालीन राजधानी रहा है। महाराणा कुम्भा से लेकर महाराणा राज सिंह के समय तक मेवाड़ पर हुए आक्रमणों के समय राजपरिवार इसी दुर्ग में रहा। यहीं पर पृथ्वीराज और महाराणा सांगा का बचपन बीता था। महाराणा उदय सिंह को भी पन्ना धाय ने इसी दुर्ग में छिपा कर पालन पोषण किया था। हल्दी घाटी के युद्ध में हार के बाद महाराणा प्रताप भी काफी समय तक इसी दुर्ग में रहे।

Advertisements

One thought on “महाराणा कुम्भा की जीवनी/ कुम्भलगढ़/कीर्ति स्तम्भ

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.