महाराणा राजसिंह का सम्पूर्ण जीवन/राजसमन्द/श्रीनाथ जी मूर्ति स्थापना

maharana rajsingh

महाराणा जगतसिंह के पुत्र राजसिंह विस्. 1709 की कार्तिक वदि 4 (10 अक्टूम्बर 1652) को मेवाड़ के राजसिंहासन पर बैठे। इनका जन्म विस्. 1686 कार्तिक वदि 2 (24 सितम्बर 1629) को हुआ। महाराणा की गद्दीनशिनी के पश्चात उन्होंने एकलिंगजी जाकर वहां पूजन करने के पश्चात् वहां के गुसाईं (मठाधिपति) ने एकलिंगजी की तरफ से उन्हें दीवान पद के चिन्हस्वरूप तलवार, छत्र, चमर और सिरोपाव दिया क्योंकि मेवाड़ राज्य के स्वामी एकलिंगजी और महाराणा उनके दीवान मने जाते है। इसी अवसर पर महाराणा ने वहां पर रत्नों का तुलादान किया। रत्नों के तुलादान का सम्पूर्ण भारत में अब तक यही एक लिखित उदाहरण मिला है।

चितौड़ किले की मरम्मत जो महाराणा जगतसिंह ने प्रारम्भ की थी उसे इन्होंने जारी रक्खा। यह यह मरम्मत कार्य बादशाह के साथ हुई सन्धि के विरुद्ध था । इसे सुनकर बादशाह शाहजहां ने नाराज होकर विस्. 1711 में एक बड़ी सेना चित्तौड़ पर भेजी। महाराणा ने इस समय लड़ाई करना उचित नहीं समझकर राजपूतो को चित्तोड़ से हटा दिया। सादुल्लाखां चित्तौड़ में 15 दिन रहकर वहां के मरम्मत किये हुए बुर्जो और कंगूरों को गिराकर बादशाह के पास लौट गया। चितौड के किले की मरम्मत को गिराया जाना तथा अजमेर की तरफ से मेवाड़ी इलाके का शाही कब्जे में चले जाना महाराणा राजसिंह को बहुत अखरता था। देवयोग से जब शाहजहाँ बीमार पड़ा तब उसके चारों पुत्र राज्य के लोभ में आपस में लड़ने लगे। ऐसे घरेलू झगड़े का मौका देखकर महाराणा ने अपने शक्ति बढ़ाना ठीक समझ बादशाही अधिकार में गये माण्डलगढ़, दरीबा, बनेड़ा, शाहपुरा, जहाजपुरा, सावर, फुलिया, केंकड़ी, मालपुरा, टोंक, सांभर, चतासू आदि स्थानों पर विस्. 1715 में अपना अधिकार कर लिया।


औरंगजेब अपने वृद्ध पिता बादशाह शाहजहाँ को कैद कर विस्. 1715 श्रावण सुदि 3 (23 जुलाई 1658) को मुग़ल राज्य का सम्राट बना। बादशाह औरंगजेब ने महाराणा और उसके कुँवर सुल्तानसिंह का खिलअत, हाथी, घोड़े, जवाहरात भेजकर आदर किया और फरमान के साथ पांच लाख रूपये तथा हाथी व् हथिनी इनाम के तौर पर भेजा। बदनोर और माण्डलगढ़ के अलावा डूंगरपुर, बांसवाड़ा, बसावर और गयासपुर (जो महाराणा जगतसिंह के समय से अलग हो गए थे) भी महाराणा को दे दिये। इस तरह औरंगजेब ने महाराणा को अपने पक्ष में कर लिया। इसलिये जब औरंगजेब के भाई दाराशिकोह ने महाराणा से सहायता चाही तो महाराणा ने कोई ध्यान नहीं दिया।


औरंगजेब के फरमान के अनुसार जब महाराणा ने डूंगरपुर, बांसवाड़ा, देवलिया (प्रतापगढ़), गयासपुर, बसावर आदि पर कब्जा करना चाहा तो वहां के लोगो ने विरोध किया। इस पर महाराणा ने सेना भेजकर उनका दमन किया और अंत में उनको अपने अधीन किया।

महाराणा और बादशाह औरंगजेब की मित्रता कायम न रह सकी। इसके मुख्य दो कारण थे। किशनगढ़ के राजा मानसिंह की बहिन चारुमति जो अत्यंत सुंदर थी। उससे औरंगजेब का विवाह तय हो चूका था। चारुमति अपनी शादी मुसलमान के साथ होने वाली है यह सुनकर अत्यंत दुःखी हुई। जब चारुमति ने अपने बचाव का कोई उपाय नहीं देखा तो उसने महाराणा राजसिंह को अर्जी भेजकर प्रार्थना की कि आप मेरे साथ विवाह कर मेरे धर्म की रक्षा करे। राजकुमारी चारुमति का विवाह औरंगजेब के साथ तय होने के बावजूद, महाराणा राजसिंह विस्. 1717(ई. सन 1660) में दल बल सहित किशनगढ़ जाकर चारुमति को ब्याह लाये। दूसरा कारण औरंगजेब हिन्दू धर्म का बड़ा द्वेषी था जबकि महाराणा हिन्दू धर्म के श्रद्धालु भक्त थे। जब औरंगजेब ने जजिया नाम का कर हिन्दुओ पर लगाया तो महाराणा ने इसका कड़ा विरोध किया।  


विस्. 1719 में मेवाड़ के दक्षिणी भाग में मीणा लोगो ने सिर उठाया तो महाराणा ने सेना भेजकर बहुतो को कैद किया, कइयों को कैद किया, कइयों को मार डाला और उनका बल तोड़ दिया। सिरोही के कुँवर उदयभान अपने पिता राव अखैराज को कैद कर स्वयं गद्दी पर बैठ गए थे परंतु महाराणा ने सेना भेजकर उदयभान को राज्य से निकालकर राव अखैराज देवड़ा को फिर से सिरोही की गद्दी पर बिठाया। महाराणा राजसिंह ने चौहान केसरीसिंह को पर पारसोली का पट्टा और राव का पद देकर अपना सरदार बनाया

बादशाह औरंगजेब कट्टर मुसलमान था और हिन्दुओ को मुसलमान बनाने, मंदिर तथा मूर्तिया तुड़वाने, हिन्दू ग्रंथो को नष्ट करने और उनका पठन पाठन रोकने के लिए उसने अधिकारी नियुक्त किये। इस प्रकार हिन्दुओ के हजारों मंदिर और हजारों मूर्तिया उसकी आज्ञा से तोड़ी गई। जब औरंगजेब ने वल्लभ सम्प्रदाय की गोवर्धन की मुख्य मूर्तियों को तोड़ने की आज्ञा दी, तब द्वारकाधीश की मूर्ति मेवाड़ में लाई गई और कांकरोली(राजसमंद) में उसकी प्रतिष्ठा कराई गई। इसी तरह गोवर्धन में स्थित श्रीनाथजी की मूर्ति को गोसाई उसे लेकर बूंदी, कोटा, पुष्कर, किशनगढ़ तथा जोधपुर गये, परन्तु जब किसी भी राजा ने औरंगजेब के दर से उस मूर्ति को अपने राज्य में रखना स्वीकार नहीं किया, तब गोंसाई दामोदर का काका गोपीनाथ चौपासनी(जोधपुर के पास) से महाराणा राजसिंह के पास आया। महाराणा ने उससे कहा कि आप प्रसन्नतापूर्वक श्रीनाथजी को मेवाड़ में ले आवे। मेरे एक लाख राजपूतो के सिर कटने के बाद ही औरंगजेब श्रीनाथजी की मूर्ति को हाथ लगा सकेगा। फिर वह मूर्ति मेवाड़ में लाई गई और सिंहाड़(नाथद्वारा) गांव में स्थापित की गयी।

विस्. 1736 सुदि 2(2 अप्रेल 1679) को औरगजेब ने सभी हिन्दुओ से जजिया नामक कर लेने का हुक्म निकाला और हिन्दुओ की कोई प्रार्थना नहीं सुनी। जो हिन्दू मस्जिद के सामने जुम्मे के रोज सम्राट से इस कर को हटाने की प्रार्थना करने पहुँचे, उनको बादशाह ने हाथी छोड़कर कुचलवा दिया, तब महाराणा ने एक जोरदार पत्र लिखकर हिन्दुओ पर जजिया कर लगाने का घोर विरोध किया। पत्र में लिखा कि ईश्वर व् खुदा एक है, मंदिर व् मस्जिद जुदा नहीं है। इसलिए बादशाह को सब प्रजा के साथ समान बर्ताव करते हुए जजिया बन्द करना चाहिये। इसका बादशाह पर कोई असर नहीं हुआ बल्कि और क्रोधित हुआ।


जोधपुर के महाराजा जशवंतसिंह पर बादशाह औरंगजेब कई कारणों से नाराज था, इसी कारण उसे अफगानिस्तान में जमरूद ठाने पर नियत किया जहा विस्. 1735 में उसका देहान्त हो गया। तब उनकी रानियो को राठौड़ दुर्गादास लेकर मारवाड़ की तरफ आते समय रास्ते में लाहौर पहुँचने पर उसकी एक राणी से अजीतसिंह का जन्म हुआ। बादशाह ने जोधपुर रियासत को खालसा कर लिया और बालक अजीतसिंह को दिल्ली में रखना चाहा परन्तु वीर दुर्गादास राठौड़ आदि सरदारों ने अजीतसिंह को वहां से बचाकर छप्पन के पहाड़ो में ले आये जहाँ बालक महाराजा अजीतसिंह राठौड़ की रक्षा में महाराणा राजसिंह का भी हाथ था। औरंगजेब को जब ये मालूम हुआ तो वह एक विशाल सेना लेकर विस्. 1736 आश्विन वदि 6 (15 सितम्बर 1679) को अजमेर पहुँचा।


औरंगजेब के लड़ने की मंशा जानकर महाराणा ने स्वर्गीय महाराणा उदयसिंह तथा महाराणा प्रतापसिंह की नीति अपनाते हुए पहाड़ो में चले गये। शाही सेना उदयपुर की और बढ़ी तथा देबारी नमक स्थान पर 4 जनवरी सन 1680 को अधिकार कर लिया। बादशाह ने उदयपुर पहुँचकर मंदिर व् मूर्तिया तुड़वा दी और शहजादा अकबर को वहां का शासक नियुक्त कर अजमेर लौट गया। परन्तु शीघ्र ही राजपूतो ने पहाड़ो से निकलकर शाही थानों पर आक्रमण किया और जगह जगह मुसलमानों को मार भगाया। शाही सेना के खाने पीने की सामग्री तक नहीं पहुँचने। अकबर के लिखे पत्रों से पाया जाता है कि राजपूत लोग अपनी शक्ति से शाही सेना को भयभीत करने में यने समर्थ हो गए थे कि शाही थानों की थानेदारी स्वीकार करने में प्रत्येक अफसर आनाकानी करता था। मुग़ल सेना घाटों में प्रवेश करने से इनकार करती थी। इस प्रकार शाही फ़ौज का पहला आक्रमण विफल हुआ। औरंगजेब ने दूसरी बार फिर विशेष तैयारी से मेवाड़ पर सेना भेजी फिर भी औरंगजेब को सिवाय हानि के इस युद्ध में कुछ पल्ले नहीं पड़ा।
इसी बीच महाराणा राजसिंह का स्वर्गवास विस्. 1737 कार्तिक सुदि 10 (22 अक्टूम्बर 1680) को हो गया। कहते है कि कुम्भलगढ़ जाते हुए ओड़ा नामक गांव में किसी ने भोजन में विष दे दिया।


महाराजा राजसिंह अपने समय के वीर, साहसी, रणकुशल, कुटनियिज्ञ और धार्मिक व् दानी थे। इन्होंने राजा होते ही रत्नों का तुलादान किया था। ऐसे तुलादान का उल्लेख भारतवर्ष के इतिहास में यह एक ही मिलता है। मेवाड़ को अकाल से बचाने के लिए इन्होंने कांकरोली के पास राजसमुंद्र नामक विशाल तालाब बनवाया और झील के पास ही राजनगर बसाया। महाराणा ने सर्वऋतुविलास नामक महल, देबारी के घाटे का कोट और दरवाजा, उदयपुर में अम्बामाता का मंदिर, राजसमुंद्र तालाब के साथ ही नोचौकी के पास पहाड़ पर महल, कांकरोली के पास वाली पहाड़ी पर द्वारकाधीश का मंदिर, देबारी के पास जया नाम की बावड़ी जिसको अब त्रिमुखी बावड़ी कहते है आदि बनवाये। हिन्दू धर्म के कट्टर भक्त होने के कारण बादशाह से इनकी सदा अनबन रही परन्तु इन्होंने सभी बाधाएं झेली।

महाराणा की 18 रानियो से 9 कुँवर:- 1 सुलतानसिंह, 2 सरदारसिंह 3 जयसिंह 4 भीमसिंह 5 सूरतसिंह 6 गजसिंह 7 इंद्रसिंह 8 बहादुरसिंह और 9 तख्तसिंह तथा एक पुत्री अजबकुवरी का होना उदयपुर राज्य के बड़वे की पुस्तक में लिखा है।

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