खानवा का युद्ध / महाराणा सांगा और बाबर के मध्य का युद्ध

खानवा का युद्ध / महाराणा सांगा और बाबर के मध्य का युद्ध

महाविनाशकारी खानवा का युद्ध 17 मार्च 1527 को आगरा से 60 किमी दूर खानवा गाँव में बाबर एवं  मेवाड़ के राणा सांगा के मध्य लड़ा गया। पानीपत के युद्ध के बाद बाबर द्वारा लड़ा गया यह दूसरा बड़ा युद्ध था।

महाराणा सांगा का अंतिम युद्ध बाबर के साथ बयाना(भरतपुर राज्य में) में हुआ। वि.स्. 1583 (20 अप्रेल 1526) को बाबर ने पानीपत की प्रसिद्ध लड़ाई में सुल्तान इब्राहिम लोदी को हराकर दिल्ली पर अधिकार किया। अब उसे भारत का सम्राट बनने के लिए राणा सांगा से युद्ध करना जरूरी था। इधर राणा सांगा भी बाबर को हरा भारत का सम्राट बनना चाहते थे।

महाराणा सांगा का सम्पूर्ण जीवन और साहसी इतिहास यहाँ पढ़े।।

इस युद्ध के कारणों के विषय में इतिहासकारों के अनेक मत हैं। पहला, चूंकि पानीपत के युद्ध के पूर्व बाबर एवं राणा सांगा में हुए समझौते के तहत इब्राहिम के खिलापफ सांगा को बाबर के सैन्य अभियान में सहायता करनी थी, जिससे राणासांगा बाद में मुकर गये। दूसरा, सांगा बाबर को दिल्ली का बादशाह नहीं मानते थे।इन दोनों कारणों से अलग कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह युद्ध बाबर एवं राणा सांगा की महत्वाकांक्षी योजनाओं का परिणाम था। बाबर सम्पूर्ण भारत को रौंदना चाहता था जबकि राणा सांगा तुर्क-अफगान राज्य के खण्डहरों के अवशेष पर एक हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता थे, परिणामस्वरूप दोनों सेनाओं के मध्य खानवा नामक स्थान पर भयंकर युद्ध हुआ।

बाबर अपनी सेना एकत्र कर सिकरी की और बढ़ा। इसी समय बाबर की एक सेना बयाना के पास हुए युद्ध में राणा सांगा से पराजित होकर लोटी तो सेना में निराशा छा गयी। बाबर ने अपने सभी सरदारों को इखट्ठा करके सब सेना के सामने शराब न पिने का प्रण किया। सोने चांदी के शराब के प्यालो को तोड़कर गरीबो में बाँट दिया। तथा एक जोशीला भाषण दिया। और सभी सरदारों से एक द्रढ प्रतिज्ञा करवाई की दम रहते रणक्षेत्र को छोड़कर कभी पीछे नहीं देखेंगे। इससे सेना में फिर जोश उत्पन्न हुआ। इसके बाद बाबर ने खुद आगे बढ़कर खानवा के मैदान में अपनी सेना को जमाया। राणा सांगा की सेना देर से पहुँची। अतः जल्दी में न तो सेना का अच्छी तरह जमाव हो सका और न ही लड़ने का अच्छा सुरक्षित स्थान प्राप्त हो सका। ऐसी स्थिति में चैत्र सुदी 14-वि.स् 1584 (17 मार्च 1527) को प्रातः दोनों सेनाओं के बीच भयंकर युद्ध सुरु हुआ।

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राणा सांगा के साथ महमूद लोदी (इब्राहिम लोदी का पुत्र) की सेना, राव गांगा जोधपुर, पृथ्वीराज आमेर, भारमल ईडर, वीरमदेव मेड़तिया, रावल उदयसिंह डूंगरपुर, नरबद हाडा बूंदी, मेदिनीराय चन्देरी, रावत बाघसिंह देवलिया, कुँवर कल्याणमल (बीकानेर के राव जैतसी का पुत्र) आदि शासको की सेना थी। इसके अलावा रावत रत्नसिंह कांगलोट, रावत जोंगा सारंगदेवोत, सोनगरा रामदास, झाला अज्ज़ा, रायमल राठौर (जोधपुर की सेना का मुखिया) वीर सिंह देव, खेतसी, दिलीप, परमार गोकुलदास, नरसिंह देव, चंद्रभान चौहान और मानिकचंद चौहान ससैन्य महाराणा के साथ थे। महाराणा स्वयं हाथी पर सवार होकर सेना का संचालन कर रहे थे। महाराणा की सेना बहुत उत्साह के साथ बाबर की सेना पर टूट पड़ी, परन्तु बाबर के पास व्यवस्थित तोपखाना था। उसकी मार के सामने राजपूतो की सेना तीर और तलवारो से मुकाबला करती रही और मुग़ल सेना को काटती हुई तोपो तक जा पहुँची। इसीप्रकार प्रारम्भ में तो राजपूत सेना को सफलता मिली, परन्तु इसी दौरान एक तीर महाराणा के सिरमें लगा और महाराणा मूर्छित हो गए। कुछ सरदार उन्हें पालकी में बैठकर युद्ध मैदान से दूर ले गए। इससे बाबर की सेना में जोश और राजपूत सेना में कुछ निराशा छा गयी। झाला अज्ज़ा ने महाराणा के सब राज्यचिन्ह धारण कर युद्ध संचालन में अपने प्राण दिए। परन्तु इस युद्ध में राजपूतो की हार और बाबर की जीत हुई। युद्ध क्षेत्र में राणा सांगा घायल हुए, पर किसी तरह अपने सहयोगियों द्वारा बचा लिए गये। खानवा के युद्ध को जीतने के बाद बाबर ने ‘ग़ाजी’ की उपाधि धरण की।

कुछ समय पश्चात वि.स्. 1584(30 जनवरी 1528) को कालपी नामक स्थान पर 46 वर्ष की आयु में अपने किसी सामन्त द्वारा विष दिये जाने के कारण महाराणा का स्वर्गवास हो गया। महाराणा की मृत्यु के समय उनके शरीर पर कम से कम 80 घाव तीर और भालों के लगे हुए थे।

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