वीर सावरकर का जीवन परिचय Veer Savarkar biography in Hindi

वीर सावरकर का जीवन परिचय Veer Savarkar biography in Hindi

विनायक दामोदर सावरकर को सभी वीर सावरकर के नाम से जानते है। ये एक लेखक, कवि और महान क्रान्तिकारी थे, जिन्होंने देश को स्वतंत्र कराने में अहम भूमिका निभाई। ये स्वतंत्रता संग्राम के एक गरम दल के नेता थे। इन्होने अपनी पढाई के साथ ही देश के लिए कई बड़े काम किए। इन्होने पुणे के एक कॉलेज से बी ए की डिग्री प्राप्त की लेकिन जब ये स्वतंत्रता आन्दोलन में शामिल हुए तो ब्रिटिश सरकार ने इनकी स्नातक की डिग्री इनसे वापस ले ली। 1906 में ये बेरिस्टर की डिग्री प्राप्त करने के लिए लन्दन गए।

वीर सावरकर का जन्म तारीख 28 मई 1883 को हुआ था। इनकी माता का नाम यशोदा सावरकर है तथा इनके पिता का नाम दामोदर सावरकर है। इनके भाई का नाम गणेश सावरकर और नारायण सावरकर था। इनकी एक बहन थी जिनका नाम मैना बाई था।वीर सावरकर की पत्नी का नाम यमुना बाई सावरकर था। इनकोने बी ए तक की पढ़ाई फर्ग्यूसन कॉलेज, पुणे, महाराष्ट्र, से पूरी की। तथा बेरिस्टर करने के लिए वो लन्दन गए। वीर सावरकर की मृत्यु 26 फरवरी 1966 को भागुर नासिक, महाराष्ट्र में हुई। विनायक सावरकर जब बहुत कम उम्र के थे, तभी इनके माता पिता की मृत्यु हो गई थी, इनके एक बड़े भाई थे जिन्होंने इन्हें पाला पोसा और इनके जीवन को सही मार्गदर्शन दिया।

वीर सावरकर की पत्नी यमुनाबाई को माई के नाम से जाना जाता है। वीर सावरकर के जीवन में भी सफलता का मुख्य श्रेय यमुनाबाई को ही जाता था। यमुनाबाई एक बेहद अलग माहोल में पली बड़ी थी, जोकि वीर सावरकर के पारिवारिक माहोल से बेहद अलग था। यमुना बाई एक बेहद संपन्न परिवार से थी और सावरकर एक मध्यमवर्गीय परिवार से थे। लेकिन फिर भी यमुना बाई ने अपने वैवाहिक जीवन को बखूबी निभाया। 1901 को नासिक में इनका विवाह हुआ। यमुनाबाई को संगीत का शौक था ये एक अच्छी गायिका थी। इन्होने अपने पति को देश प्रेम के लिए जाग्रत किया इनकी देशभक्ति कविताओ को एक आवाज दी। इन्होने देश की महिलाओं में भी राष्ट्र भावना को जाग्रत किया।

वीर सावरकर ने कई संगठन बनाएं और देश को आजाद कराने में अपना योगदान दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवकसंघ जिसे आरएसएस (RSS) के नाम से भी जाना जाता है इस संघ की स्थापन 5 लोगो ने की थी जिनमे से एक वीर सावरकर के बडे भाई गणेश दामोदर सावरकर भी थे। वीर सावरकर ने छात्रो का एक संगठन बनाया और अंग्रेजो को भारत से बाहर निकालने की योजना बनाई। इन्होने एक किताब भी लिखी जिसका नाम था सिपोय म्युटिनी, जिसमे इन्होने स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए किए जा रहे पहले युद्ध की कहानी लिखी। इस किताब को एक बड़ी सफलता मिली और इसे कई भाषाओं में प्रसारित किया गया। इन्होने ब्रिटेन में एक समान विचारधारा के लोगों का एक समूह बनाया। इनकी इन गतिविधियों को देख ये पुलिस की नज़रो में आ गए।

13 मार्च 1910 को ये लन्दन में गिरफ्तार कर लिए गए और इन्हें भारत भेजा गया। जब इन्हें जहाज से भारत लाया जा रहा था तब ये जहाज से छुप कर निकल कर पानी में चले गए और बेहद ठन्डे पानी में तैरकर किनारे पर पहुचें यहाँ इन्होने अपने कुछ मित्रो को पहले से ही आने के लिए कहाँ था लेकिन उन्हें आने में देरी हो गई और सावरकर को दोबारा पकड़ा गए और इन्हें पचास साल के कठिन कारावास की सजा दी गई। इन्हें 4 जुलाई 1911 को पोर्ट ब्लेयर के सेलुलर जेल भेजा गया। इनके साथ जेल में बहुत ही सख्त व्यवहार किया जाता था। वीर सावरकर को ब्रिटिश सरकार ने बेहद कठिन कारावास की सजा सुनाई उन्हें अन्य कैदियों से अधिक सख्ती से रखा जाता था और जो सुविधाएँ अन्य कैदियों को दी जाती थी वो भी इन्हें पाप्त नही थी। इन्हें अकेले एक अलग जेल में कैद किया था और जमानत पर रिहा भी नही किया गया। इन्होने कई बार माफीनामा लिखा और याचिका की कि उन्हें जेल से रिहा कर दिया जाएँ। जब कई बार इन्होने ब्रिटिश सरकार से याचना की तब 10 साल बाद इन्हें रिहा किया गया। इन्होने ब्रिटिश सरकार से वादा किया कि ये कभी भी उनके विरोध में नहीं जाएंगे।

जब भगत सिंह केवल 23 वर्ष के थे इन्हे फांसी की सजा सुनाई गई थी। इन्होने शहीद होने के लिए एक कदम भी पीछे नही लिया इन्होने ब्रिटिश सरकार की दयालुता लेने से साफ़ इनकार कर दिया। इन्हें इनके कई शुभचिंतको और परिवार वालो ने याचना करने के लिए कहाँ पर ये नही माने ये हस्ते हस्ते फांसी के फंदे पर झूल गए। वीर सावरकर ने कारावास में रह कर कई बार ब्रिटिश सरकार से क्षमा याचना की और कहाँ कि वे कभी भी ब्रिटिश सरकार के विरोध में नही जाएँगे ये इन्होने केवल जेल से रिहा होने के लिए कहाँ था। इनके समर्थक बताते है कि ये भले भी ब्रिटिश सरकार से वादा किया इसके पीछे इनकी एक योजना थी। लेकिन इन्होने अपना हिंदुत्व की भावना नही छोड़ी और ये अलग रूप में देश की स्वतंत्रता प्राप्ति की लड़ाई लड़ रहे थे।

इन्होने जैक्सन नाम के एक कलेक्टर का खून कर दिया था जोकि महाराष्ट्र राज्य के नासिक जिले में कार्यरत था। अप्रैल 1911 को इन्हें काला पानी का कठिन कारावास दिया गया। इन्हें जेल के तृतीय तल के एक बेहद छोटे से कमरे में रखा गया था। कमरे में केवल पानी का मटका और गिलास था इनके हाथ और पैरों में बेडिया बंधी थी। इन्हें अकेले एक काली कोठरी में रखा था और इनके साथ और किसी भी कैदी को नही रखा गया। इनके भाई गणेश भी इस जेल में कैदी थे लेकिन इन्हें इतना सख्ती से रखा जाता था कि इन्हे इस बात का अंदाजा भी नही लगा कि उनके भाई भी इसी जेल में कैद है। इन्होने 1911 से 1921 तक 10 साल के कठिन कारावास की सजा काटी।

देश की स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद गांधी जी की हत्या कर दी गई। यह देश के लिए एक बेहद दुखद घडी थी। इस घटना के दो मुख्य आरोपी थे एक नाथूराम गोडसे और नारायण आपटे। ये दोनों ही आरोपी वीर सावरकर के साथ अक्सर दौरा किया करते थे। जब गाँधी जी की हत्या की गई तब सावरकर के घर पर भी पत्थरबाजी की गई। इनके विरोध में नारे लगाए गए औऱ इन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। लेकिन इन्होने कहाँ कि वे इस अपराध में शामिल नही थे उन्हें इस बात का कोई अंदाजा नही था।

प्रियदर्शन के डायरेक्शन में 1996 में काला पानी नाम से एक फिल्म बनाई गई थी। इसमें वीर सावरकर के कठिन जीवन को दर्शाया गया था, इसमें शैलेन्द्र गौर ने मुख्य भूमिका में वीर सावरकर का रोल निभाया। वीर सावरकर के जीवन के महत्वपूर्ण क्षणों को एक फिल्म में बेहद खुबसुरत तरीके से दर्शाया गया है यह फिल्म 2001 में आई थी। श्री नरेन्द्रमोदी ने इसे गुजरती संस्करण में भी रिलीज करने का अनुरोध किया। 2012 में इसका गुजरती भाषा में भी प्रसारण किया गया।

वीर सावरकर का कहना था की जब किसी व्यक्ति के जीवन के सभी लक्ष्य पूर्ण हो जाएँ तब यदि वह मृत्यु की और अग्रसर हो तो उसे आत्मसमर्पण कहते है। सावरकर देश की स्वतंत्रता प्राप्ति से बेहद प्रसन्न थे वे अपने जीवन के सभी लक्ष्यों को प्राप्त कर चुके थे। तब इन्होने 3 फरवरी 1966 को अपना अन्न जल त्याग दिया और अपने चिकित्सक को कोई उपचार ना देने का अनुरोध किया और 26 फरवरी 1966 को करीब 11 बजे अपना देह त्याग दिया और मृत्यु को प्राप्त हुए। वीर सावरकर की याद में कई भवन, कॉलेज, स्कूल, चौक, सेतु, एअरपोर्ट आदि का निर्माण किया गया है। जिस जेल में इन्होने अपने काला पानी की सजा भोगी थी और बेहद यातनाएं सही थी उस जेल को भी अब एक स्मारक का रूप प्राप्त कर एक पर्यटन स्थल बना दिया गया है। यह स्मारक अंडमान में स्थापित है और इसे लोग दूर दूर से देखने आते है यह स्मारक शहीदों के बलिदान का प्रतीक है।

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