ममता कालिया द्वारा रचित दूसरा देवदास का अंश





दूसरा देवदास कहानी हर की पौड़ी, हरिद्वार के परिवेश को केंद्र में रखकर युवामन की संवेदना, भावना की आकर्षक प्रस्तुति है। यह कहानी युवा मन मे पहली आकस्मिक मुलाकात की हलचल, कल्पना और रुमानियत का उदाहरण है। यह प्रथम आकर्षण पर केंद्रित कहानी है जिसमे किसी निश्चित व्यक्ति और समय के बिना प्रेम आकर्षण को बताया गया है।

हर की पौड़ी में आरती के समय पंडित जी स्वर के साथ आरती सुरु करते है जय गंगे माता, जो कोई तुझको ध्याता, सारे सुख पाता, जय गंगा माता आरती में ज्यादातर औरते नहाकर बिना कपड़े बदले गीले कपड़े में ही खड़ी हो जाती है। आरती के बाद भक्त आरती लेते है चढ़ावा चढ़ाते है।


सम्भव काफी देर से नहा रहा था। घाट पर आकर लापरवाही से कपड़े पहन चश्मा लगा रहा था तभी पण्डे ने चन्दन का तिलक लगाना चाहा पर सम्भव ने चेहरा हटा लिया। पण्डे ने चन्दन के बिना स्नान अधूरा बता तिलक लगा दिया।
वह सीढ़िया चढ़कर जाने लगता है तभी पोड़ी पर बने छोटे मंदिर के पुजारी दर्शन करने के लिए आवाज लगा देता है।

उसका मन तो नहीं था पर नानी ने मंदिर में बीस रुपये चढाने को कहे थे इसलिए चला जाता है।
सम्भव ने कुरते में हाथ डाला । एक रुपया तो मिल जाता है पर चवन्नी नहीं मिलती है तो पुजारी छुट्टा देने की बात कहता हे तो सम्भव दो का नोट निकाल के पुजारी को दे देता है। पुजारी ने चरणामृत दिया और लाल कलावा बाँधने लगता है तभी एक और नाजुक सी कलाई पुजारी की तरफ बढ़ आई। पुजारी ने उस हाथ पर कलावा बांध दिया।

लड़की अब बिलकुल बराबर में खड़ी आंख मूंदकर अर्चन कर रही थी। सम्भव यकायक उसकी और मुड़ता है। उसके कपड़े एकदम गीले थे, लड़की के गीले बाल पीठ पर काले चमकीले शॉल की तरह लग रहे थे। दीपक के उजाले, आकाश और जल की सांवली संन्धी-बेला में लड़की बेहद सौम्य, लगभग कांस्य प्रतिमा लग रही थी।

लड़की ने कहा,

आज तो आरती हो चुकी। क्या करे हमे देर हो गई

जाने कैसे पुजारी ने लड़की के हम को युगल अर्थ में लिया और उसके मुंह से अनायास आशीष निकली,

सुखी रहो, फुलोफलो, जब भी आना साथ ही आना, गंगा मैया मनोरथ पुरे करे।

लड़का और लड़की दोनों अकबका कर छिटककर दूर हो जाते है।
दोनों तुरंत चल पड़ते है।
शायद उनकी चपले एक ही जगह पड़ी थी, चपले लेते समय दोनों की निगाहें एक बार फिर टकरा गई। आँखों का चकाचोंध अभी मिटा नहीं था।

सम्भव आगे बढ़ कर कहना चाहता था, देखिए इसमें मेरी कोई गलती नहीं थी पुजारी ने गलत अर्थ ले लिया। लड़की कहना चाहती थी, आपको इतना पास नहीं खड़ा होना चाहिए था।

लड़की ने अपना होंठ दाँतो में दबाकर छोड़ दिया। भूल उसी की थी बाद में वही आई थी। अँधेरे में कहा कितनी पास खड़ी हुई उसे कुछ खबर नहीं थी। दोनों ने नजरे बचाते हुए चपले पहनी।
लड़की घबराहट में ठीक से चपले नहीं पहन पाई, थोड़ी सी अंगूठे में अटकाकर ही आगे बढ़ गईं।
सम्भव ने आगे बढ़ के देखना चाहा पर वो नहीं देख पाया लड़की कहा ओझल हो गयी।
काफी ढूंढने पर भी वो नही मिली, आखिर भटकते-भटकते संभव हार गया। पस्त कदमो से वह घर की और मुड़ा।
घर पहुचते ही सम्भव नानी से कह सोने चला जाता है। गंगा को छूकर आती हवा से आँगन काफी शीतल था।

ऊपर से नानी ने रोज की तरह शाम को चोक धो डाला था।

नींद और स्वप्न के बीच सम्भव की आँखों में घाट की पूरी बात उतर आई। लड़की का आँख मूंदकर अर्चना करना, माथे पर भीगे बालो की लट, कुरते को छूता उसका गुलाबी आँचल और पुजारी से कहता उसका सौम्य स्वर,
“हम कल आएंगे।”

सारी रात सम्भव की आँखों में शाम मंडराती रही। उसकी उम्र ज्यादा नहीं थी इसी साल MA किया था। हरिद्वार गंगा दर्शन करने और नानी से मिलने आया था।

अभी तक उसके जीवन में कोई लड़की किसी अहम भूमिका में नहीं आई थी। लडकिया तो क्लास में बायीं तरफ की बेंचो पर बैठनेवाली एक कतार थी। इस तरह बिलकुल अकेली, अंजान जगह पर, एक अनाम लड़की का सद्द-स्नात दशा में सामने आना, पुजारी का गलत समझना, आशीर्वाद देना, लड़की का घबराकर चल देना सब मिलाकर एक नयी निराली अनुभूति थी जिसमे उसे कुछ सुख और ज्यादा बेचैनी लग रही थी। उसने मन ही मन तय किया कि कल शाम 5 बजे से ही वह घाट पर जाकर बैठ जायेगा।
लड़के ने उठते उठते तय किया की आज वो नहायेगा नहीं सिर्फ हाथ पैर धोकर प्रार्थना कर लेगा। कुछ देर पोड़ी पर बैठकर गंगा की जलराशि निहारेंगा।
वास्तव में पौड़ी पर आज अद्धभुत भीड़ थी। गंगा के घाट से ही चोड़ा मानव रैला दिखाई दे रहा था।
भीड़ लड़के ने दिल्ली में भी देखी थी, दफ्तर जाती भीड़ , खरीद फरोख्त करती भीड़, तमाशा देखती भीड़।लेकिन इस भीड़ का महत्व निराला था इसमें एक सूत्रता थी। यहा न जाती का महत्व था, न भाषा का, महत्व उध्धेस्य का था और वह सबका समान था, जीवन के प्रति कल्याण की कामना।
एक छोटे से लड़के ने हँसते हुए उसका ध्यान भंग किया।

भैया आप नहीं नहाएंगे?

सम्भव ने गौर किया न जाने कब ये बच्चा उसके नजदीक आ बैठा। उसने बच्चे से पूछा अकेले हो।
नहीं बुआ साथ है
कहाँ से आये हो
रोहतक
अब वापस जाओगे
नहीं बच्चे ने बताया, अभी तो मंशा देवी जाना है।।
यह स्थल सम्भव को पहले दिन से ही अपनी और खिंच रहा था पर नानी ने मना किया था झुलगाड़ी में नहीं बैठना जाना हो तो पैदल हो चढ़कर जाना।

सम्भव ने बच्चे से कहा- अगर गिर गए तो?.

बच्चा हंसा,- इतने बड़े होकर डरते हो भैया? गिरेंगे कैसे इतने लोग जो चढ़ रहे है।
शहर के इतिहास के साथ साथ सम्भव उसका भूगोल भी आत्मसात करना चाहता था इसलिये थोड़ी देर में वह उस स्थान पर पहुँच जाता है जहाँ से रोपवे सुरु होती थी।
जल्द ही वह उस विशाल परिसर में पहुँच गया जहाँ लाल, पिली, नीली, गुलाबी केबिल कार आकर रूकती, चार आदमी बैठती और चली जाती। सम्भव एक गुलाबी केबिल कार में बैठ गया। कल से उसे गुलाबी के सिवा कोई और रंग सुहा ही नहीं रहा था,,,,
बहुत जल्दी उसकी केबिल कार मंसा देवी के द्वार पर पहुँच गयी। वहां पर बच्चे चढ़ावे की ठेलिया बेचने खड़े थे। वहां से सम्भव ने एक थैली ली और मंशा देवी के प्रांगण में पहुँच गया। नाम मंशा देवी का था पर असर सभी देवी देवताओं का मिला झूला था। सम्भव ने पूरी श्रद्धा से मनोकामना की, गांठ लगाई, सिर झुकाया, नैवेद्ध चढ़ाया और वहां से बाहर आ गया।
सम्भव फिर से केबिल कार की कतार में लग गया। आने का रास्ता ढलान पर था कार और भी जल्दी पहुँच रही थी।

वो कार की ढलवा दौड़ को देख ही रहा था कि दो आश्चर्य एक साथ गठित हुए।


वह बच्चा जो पोड़ी पर मिला था वो दूर पिली कार में दिखाई दिया और बच्चे से सटी हुई दुबली, पतली श्याम सलौनी आकृति बैठी हुई थी। वह थी वही लड़की जो कल शाम के जुतपुटे में हर की पौड़ी पर टकराई थी।
सम्भव बेहद बेचैन हो गया वह दाएं बाएं झुक झुककर देखने की कोशिश करने लगा। उसका मन हुआ पंछी की तरह उड़ कर पिली केबिल कार में पहुँच जाएं।
बहुत जल्दी केबिल कार नीचे पहुँच गयी।
सम्भव ने आगे आगे जा रहे बच्चे को लपककर थाम लिया और बोला,” कहो दोस्त?”
बच्चे ने अचकचाकर उसकी और देखा, “अरे भैया” सम्भव रुककर बोला,”हमने सोचा जब हमारा दोस्त नहीं डरता तो हो जाये एक ट्रिप।”
तभी आगे से एक महीन सी आवाज ने कहा, “मुन्नू घर नहीं चलना है।”
मुन्नू ने कहा,” अभी आया भुआ।”
सम्भव ने उस्फुट स्वर में पूछा,” ये तुम्हारी भुआ है?”
“और क्या” मुन्नू ने आश्चर्य से कहा।
“हमे नहीं मिलोगे, हम तो तुम्हारे दोस्त है।”
मुन्नू वास्तव में उसका हाथ खिंचता हुआ चल दिया, “भुआ भुआ, इनसे मिलो, ये है हमारे नये दोस्त।”
उसने प्रश्नवाचक नजरो से सम्भव को देखा, “अपना नाम खुद बताए।” वह अपना नाम बताता उससे पहले उसी महीन मीठी आवाज ने कहा, “ऐसे कैसे दोस्त है तुम्हारे, तुम्हें उनका नाम भी नहीं पता?”
अब सम्भव ने गोर किया, बिल्कुल वही कंठ, वही उलाहना, वही अंदाज। पुलक से उसका रोम रोम हिल उठा। हे ईश्वर उसने कब सोचा था

मनोकामना का मौन उद्गार इतनी शीघ्र शुभ परिणाम दिखायेगा।
लड़की ने आज गुलाबी परिधान नहीं पहना था पर सफेद साड़ी में लाज से गुलाबी होते हुए उसने मंसा देवी पर एक और चुनरी चढ़ाने का संकल्प लेते हुए सोचा, “मनोकामना की गांठ भी अदभुत अनूठी है, इधर बान्धो उधर लग जाती है।”
“पारो बुआ, पारो बुआ इनका नाम है…..” मुन्नू ने बुआ का आँचल खीचते हुए कहा।
“सम्भव देवदास” सम्भव ने हँसते हुए वाक्य पूरा किया। उसने भी मनोकामना का लाल पिला-धागा उसमे पड़ी मीठी गठान का मधुर स्मरण हो गया।